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रात जब अत्यधिक अंधकारमय होती है, तब संसार की हर वस्तु अपनी एक परछाई रचती है। दिन के उजाले में जो स्पष्ट दिखाई देता है, वही रात के सन्नाटे में धुंधला पड़ जाता है और जो धुंधला है, वही कभी-कभी सबसे अधिक सच्चा प्रतीत होता है। मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है, वह अपने अन्दर जितना प्रकाश लिए फिरता है, उससे कहीं अधिक अंधेरा अपने साथ ढोता है, एक ऐसा अंधेरा, जिसे वह स्वयं भी पूरी तरह नहीं पहचानता।
"परछाइयों का सच" केवल एक अपराध जगत की कहानी नहीं है; यह उस अदृश्य संसार की यात्रा है, जहाँ हर चेहरा दो हिस्सों में बंटा होता है। एक जो समाज को दिखाया जाता है, और दूसरा जो भीतर, गहराई में, किसी अंधेरी कोठरी में छुपा रहता है। यही वह कोठरी है, जहाँ से परछाइयाँ जन्म लेती हैं।
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